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सुप्रीम कोर्ट ने एससी‑एसटी एक्ट के तहत एसबीआई अधिकारियों के खिलाफ FIR रद्द की

सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के तहत एसबीआई अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया है।

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Key points

  • सुप्रीम कोर्ट ने कर्ज वसूली विवाद को जातिगत अत्याचार का रंग देने को कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया।
  • अदालत ने पाया कि शिकायत में विरोधाभास था क्योंकि कंपनी को एससी-एसटी महिलाओं द्वारा प्रबंधित बताया गया जबकि एमडी महिला नहीं है।
  • कोर्ट ने निर्देश दिया कि फर्जी दस्तावेज और पैकेज विवाद जैसे मुद्दों को कर्ज वसूली न्यायाधिकरण (DRT) में उठाया जा सकता है।

Why it matters. यह फैसला स्पष्ट करता है कि व्यावसायिक और कर्ज वसूली विवादों को जातिगत भेदभाव के आधार पर आपराधिक मुकदमों में नहीं बदला जा सकता।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने हैदराबाद में 2019 में दर्ज एसबीआई अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर रद्द कर दी। कंपनी निदेशक वाई राजशेखर ने 2016 में एनपीए हुए खाते के पुनरुद्धार पैकेज से इनकार और जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसे व्यावसायिक विवाद बताते हुए कहा कि केवल निदेशक के एससी/एसटी होने से पैकेज न देना आपराधिक मामला नहीं बनता।

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सुप्रीम कोर्ट ने एससी‑एसटी एक्ट के तहत एसबीआई अधिकारियों के खिलाफ FIR रद्द की

सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर सख्त टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि कर्ज वसूली जैसे व्यावसायिक विवाद को जातिगत अत्याचार का रंग नहीं दिया जा सकता। ऐसे मामलों में आपराधिक मुकदमा चलाना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है। कोर्ट ने कहा कि जाति के आधार पर अपमान का ठोस आरोप होना आवश्यक है। इसी आधार पर जस्टिस जेबी पारदीवाला व जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के अधिकारियों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज एफआईआर रद्द कर दी। यह एफआईआर 2019 में हैदराबाद में दर्ज हुई थी। कंपनी के निदेशक ने बैंक कर्मचारियों पर दर्ज कराया था मुकदमा एसबीआई ने एक कंपनी को कर्.

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